रथ निर्माण के लिए दरभा जंगल से पहुंचीं लकडिय़ां, 75 दिनों तक चलेगा बस्तर दशहरा

रथ निर्माण के लिए दरभा जंगल से पहुंचीं लकडिय़ां, 75 दिनों तक चलेगा बस्तर दशहरा
जगदलपुर (चैनल इंडिया)। करीब 75 दिनों तक मनाए जाने वाले बस्तर दशहरा पर दो मंजिला रथ का संचालन किया जाता है। यह परंपरा 620 साल से अनवरत जारी है। इस वर्ष भी नवरात्र से प्रतिदिन रथ की परिक्रमा होगी। हर वर्ष इन दो मंजिला रथ का निर्माण बस्तर अंचल के अलग-अलग गांव से आए हुए ग्रामीण कारीगर करते आए हैं। सिरहासार भवन के सामने यह रथ निर्माण किया जाना है।
रथ निर्माण के लिए दरभा के जंगल से साल व सागौन की लकडिय़ों को लाया जा रहा है। यहां करीब 6 ट्रक में भरकर 55 घन मीटर लकडिय़ां लाई जा रही हैं। इन मोटे ल_ों से दो मंजिला विशालकाय रथ का निर्माण किया जाएगा। बस्तर के झाडउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के पुश्तैनी कारीगर अपने परंपरागत औजारों से इन्हें चीरकर रथ का निर्माण करेंगे। खास बात यह है कि समूचे रथ निर्माण में लोहे की कील नहीं उपयोग में लाई जाती है।
इस बार आठ चक्कों वाले विजय रथ का संचालन होना है। मान्यता के अनुसार बस्तर राजा का जगन्नाथ पुरी के राजा ने रथ पति की उपाधि दी थी। उन्हें 16 चक्कों का एक रथ भी संचालन करने दिया गया था। कालांतर में इस 16 चक्का के रथ को तीन भाग में बांट दिया गया है। इसमें चार चक्का का रथ गोंचा पर्व पर भगवान जगन्नाथ को समर्पित किया गया है। इसके बाद आठ चक्कों का विजय रथ व चार चक्कों का फूल रथ की परिक्रमा नवरात्र पर होती है। इन रथ पर आराध्य देवी माता दंतेश्वरी व माता मावली के छत्र को रखा जाता है।
लाखों की संख्या में जुटते हैं श्रद्धालु
नवरात्र व बस्तर दशहरा के अनूठे अनुष्ठान को देखने के लिए देश-विदेश के एक लाख से अधिक श्रद्धालु बस्तर पहुंचते हैं। यहां रोजाना रथ संचालन व विविध धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं। बस्तर में दशहरा पर रावण का दहन नहीं किया जाता है। इसलिए यह दशहरा अन्य प्रांतों के दशहरा से भिन्न है।