बंधन आगंतुक और मोक्ष स्वतः सिद्ध है : इंदुभवानंद तीर्थ जी महाराज
रायपुर। शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में जारी चातुर्मास की प्रवचन श्रृंखला को गति देते हुए श्री शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ महाराज ने बताया कि बंधन आगन्तुक है और मोक्ष स्वतः सिद्ध है। प्रकृति के आठ गुणों से बंधे हुए जीव को बद्धजीव कहा जाता है और प्रकृति आदि आठ गुणों को अपने वश में करने वाले जीव को मुक्तजीव कहा जाता है। बद्ध जीव जब बंधन से मुक्त हो जाता है तभी उसे मुक्त जीव कहा जाता है।

प्रकृति बुद्धि अहंकार और पंच तन्मात्राएं( रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श) इन्हीं को प्रकृति अष्टक कहा जाता है। प्रकृति के आठ तत्वों के समूह से जीव की उत्पत्ति होती है उसे देह प्राप्त होती है और देश से कर्म उत्पन्न होता है फिर कर्म से नूतन देह की उत्पत्ति होती है इस प्रकार बार-बार जन्म और कर्म के बंधन से जीव बध जाता है।

इसी को बंधन कहा जाता है वास्तव में जीव स्वयं ही अपने आप को बंधन में डाल लेता आत्मा में किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है। आत्मा शुद्ध, बुद्ध,मुक्त स्वरूप है। बंधन अध्यस्त है। आत्मा की अपरोक्ष नुभूति होने से बंधन नहीं रहता है। वास्तव में बंधन और मोक्ष माया के गुणों के अधीन है माया के तीन गुण सत्व,रज और तम ही जीव के बंधन के कारण बनते हैं। बंधन माया केगुणों के कारण होता है और मोक्ष स्वतः सिद्ध है। कथा के पूर्व समस्त भक्तों ने भगवान शिव की आरती की तथा जगतगुरु कुलम् के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण किया।
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