'पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ' हितलकुडुम की महापंचायत में बोधघाट प्रोजेक्ट का विरोध

'पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ' हितलकुडुम की महापंचायत में बोधघाट प्रोजेक्ट का विरोध

जगदलपुर (चैनल इंडिया)। बस्तर क्षेत्र में 50 साल पुराने बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने की तैयारी के बीच वहां के आदिवासियों का विरोध तेज हो गया है। प्रभावित गांवों के लोगों ने साफ शब्दों में कहा है कि उनकी जमीन, जंगल और घरों को उजाड़कर किसी भी कीमत पर बांध नहीं बनाया जा सकता है। विरोध प्रदर्शन के दौरान कई ग्रामीणों ने नारे लगाए और फिर कहा कि पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ। 

बोधघाट परियोजना का प्रस्ताव कई साल पहले रखा गया था। इस प्रोजेक्ट के तहत बड़ी संख्या में गांवों के डूब क्षेत्र में आने की आशंका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यह बांध बनता है तो हजारों परिवारों को अपने घर छोडऩे पड़ेंगे। इसके अलावा खेती की जमीन, जंगल और पारंपरिक आजीविका के साधन भी असर होगा। 

दंतेवाड़ा जिले के बारसूर के पास हितलकुडुम गांव में आयोजित एक विशाल महापंचायत में हजारों आदिवासियों ने साफ  चेतावनी दी है कि 'पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ'। इस परियोजना से प्रभावित होने वाले 56 गांवों के निवासियों ने दो टूक कहा है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन, जंगल और सदियों पुराने पवित्र धार्मिक स्थलों को डूबने नहीं देंगे। 18 ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि इस रैली में अपने पारंपरिक देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों के साथ विरोध दर्ज कराने पहुंचे थे।

प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इस विशाल बांध के बनने से दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों के दर्जनों गांव पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। अनुमान के मुताबिक इस परियोजना के कारण 16,000 हेक्टेयर से अधिक की वन भूमि जलमग्न हो जाएगी और हजारों आदिवासियों को बेघर होना पड़ेगा। महापंचायत में शामिल हुए बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि एक तरफ  विकास की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ बस्तर को उजाडऩे की तैयारी की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना से 50,000 से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि बोधघाट परियोजना से क्षेत्र में बिजली उत्पादन बढ़ेगा और विकास को गति मिलेगी. हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास तभी सार्थक होगा, जब उससे प्रभावित होने वाले लोगों की सहमति और हितों का पूरा ध्यान रखा जाए. फिलहाल, परियोजना को लेकर बस्तर में माहौल गर्म है. आदिवासी संगठन और ग्रामीण लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि अपनी जमीन और जंगल बचाने के लिए वे हर लेवल पर संघर्ष जारी रखेंगे.