बस्तर के जंगलों से राष्ट्रपति भवन तक: जब ‘बड़ी दीदी’ और गोडबोले दंपत्ति के मूक त्याग को मिलेगा देश का सर्वोच्च सम्मान

बस्तर के जंगलों से राष्ट्रपति भवन तक: जब ‘बड़ी दीदी’ और गोडबोले दंपत्ति के मूक त्याग को मिलेगा देश का सर्वोच्च सम्मान

रायपुर। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में सोमवार को आयोजित होने वाले नागरिक अलंकरण समारोह में छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की तीन समाजसेवी विभूतियों को पद्म श्री सम्मान से अलंकृत किया जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सुदूर वनांचलों में दशकों से सेवा कार्य कर रहे डॉ. बुधरी ताती, जिन्हें आदिवासी समाज “बड़ी दीदी” के नाम से जानता है, तथा समाजसेवी दंपत्ति डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले को सम्मानित करेंगी।

हाल के वर्षों में पद्म पुरस्कारों को “पीपल्स पद्म” के रूप में नई पहचान मिली है। अब ये सम्मान केवल बड़े शहरों और चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन गुमनाम समाजसेवियों तक पहुंच रहे हैं जिन्होंने समाज के अंतिम छोर पर खड़े लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। बस्तर और अबूझमाड़ जैसे दुर्गम व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले इन समाजसेवियों का चयन इसी बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है।

दंतेवाड़ा जिले के हीरानार गांव की रहने वाली डॉ. बुधरी ताती पिछले चार दशकों से वनवासी समाज के बीच शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और स्वास्थ्य जागरूकता के लिए काम कर रही हैं। वर्ष 1984 में उन्होंने अपनी सेवा यात्रा शुरू की थी, जब बस्तर के कई गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। उन्होंने सैकड़ों गांवों तक पैदल पहुंचकर आदिवासी परिवारों को शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक किया और बालिकाओं को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया।

“बड़ी दीदी” ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई-कढ़ाई और हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए। उनके प्रयासों से कई आदिवासी महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हुईं और अनेक युवतियां नर्सिंग जैसे पेशों से जुड़कर मुख्यधारा में आईं। इसके साथ ही उन्होंने कुपोषण, शराबखोरी, घरेलू हिंसा और अंधविश्वास जैसी सामाजिक समस्याओं के खिलाफ भी अभियान चलाया।

वहीं, डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले ने बस्तर और महाराष्ट्र के वनांचलों में स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने का कार्य किया। जब दूरस्थ आदिवासी इलाकों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं लगभग नहीं थीं, तब इस दंपत्ति ने दुर्गम गांवों में पहुंचकर लोगों का इलाज किया और स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने का काम किया। उन्होंने कुपोषित बच्चों की पहचान, स्वास्थ्य शिविरों के आयोजन और ग्रामीण युवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण देने जैसे कई महत्वपूर्ण प्रयास किए।

गोडबोले दंपत्ति ने आदिवासी समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित करने और आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के प्रति विश्वास बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई। उनकी निस्वार्थ सेवा के कारण बस्तर अंचल में उन्हें विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

इस वर्ष देशभर में कुल 131 पद्म पुरस्कार घोषित किए गए हैं, जिनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं। राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाला यह समारोह केवल सम्मान वितरण तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उन गुमनाम नायकों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने का प्रतीक बन गया है, जिन्होंने बिना किसी प्रचार या अपेक्षा के समाज सेवा को अपना जीवन बना लिया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं जनजातीय पृष्ठभूमि से आती हैं। ऐसे में उनके हाथों से बस्तर के वनांचलों में कार्य करने वाले इन समाजसेवियों को सम्मान मिलना विशेष रूप से प्रेरणादायक माना जा रहा है। यह सम्मान इस बात का संदेश भी देता है कि देश अब बस्तर को केवल संघर्ष और नक्सलवाद की दृष्टि से नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और सामाजिक परिवर्तन की भूमि के रूप में भी पहचान दे रहा है।