आदिवासी समाज के स्वास्थ्य, शिक्षा सहित सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित गोडबोले दंपत्ति
दंतेवाड़ा से राजू शर्मा की रिपोर्ट
36 वर्षों से बस्तर की सेवा, पूरे जीवन को बस्तर के नाम कर देने वाली सेवा की मिसाल
दंतेवाड़ा। कुछ लोग जीवन में सफलता का रास्ता चुनते हैं, तो कुछ लोग सेवा का। डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुनीता गोडबोले ने पिछले 36 वर्षों से बस्तर की धरती पर निस्वार्थ भाव से जनसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसने न केवल उनका जीवन बदल दिया, बल्कि बस्तर के हजारों आदिवासी परिवारों के जीवन में भी नई उम्मीद की किरण जगाई। आज जब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री से उन्हें सम्मानित किया गया है, तब यह सम्मान केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि बस्तर की 36 वर्षों की समर्पित जनसेवा का राष्ट्रीय सम्मान बन गया है।

महाराष्ट्र के सातारा जिले के मूल निवासी डॉ. रामचंद्र गोडबोले आयुर्वेद चिकित्सक हैं, जबकि उनकी पत्नी श्रीमती सुनीता गोडबोले ने समाज कार्य (एमएसडब्ल्यू) की शिक्षा प्राप्त की है। वर्ष 1990 में विवाह के बाद दोनों ने अपना जीवन समाज सेवा के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के संगठन मंत्री ने उन्हें सेवा कार्य के लिए मेघालय और बस्तर, दोनों क्षेत्रों का विकल्प दिया। गोडबोले दंपत्ति ने बिना किसी हिचकिचाहट के बस्तर को चुना और यहीं से शुरू हुई उनकी जीवनभर की सेवा यात्रा।
डॉ. गोडबोले बताते हैं कि जब वे पहली बार बस्तर पहुंचे, तब यह क्षेत्र उनके लिए पूरी तरह नया था। यहां की बोली, संस्कृति, रहन-सहन और जीवनशैली सब कुछ अलग था। शुरुआती दिनों में लोगों का विश्वास जीतना सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। गांव-गांव जाकर लोगों के बीच रहे, उनकी भाषा को समझा, उनकी पीड़ा को महसूस किया और धीरे-धीरे विश्वास का ऐसा रिश्ता बना कि लोग उन्हें अपना मानने लगे। समय के साथ मरीजों की संख्या बढ़ती गई और उनका छोटा-सा उपचार केंद्र जनविश्वास का प्रतीक बन गया।
डॉ. रामचंद्र गोडबोले ने दूरस्थ वनांचलों में हजारों गरीब और जरूरतमंद आदिवासियों का निःशुल्क उपचार किया। जहां स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं थीं, वहां उन्होंने चिकित्सा शिविरों के माध्यम से लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाईं। गंभीर मरीजों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचाकर उनका उपचार सुनिश्चित कराया। उनकी चिकित्सा सेवा केवल इलाज तक सीमित नहीं रही, बल्कि जनजातीय समाज को स्वस्थ और जागरूक बनाने का एक व्यापक अभियान बन गई। दूसरी ओर, श्रीमती सुनीता गोडबोले ने गोंडी और हल्बी जैसी स्थानीय बोलियां सीखकर आदिवासी महिलाओं और बच्चों के बीच सहज संवाद स्थापित किया। उन्होंने कुपोषण उन्मूलन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, बाल शिक्षा, सिकल सेल एनीमिया जागरूकता, बाल अधिकार संरक्षण और बालिकाओं के सशक्तिकरण जैसे विषयों पर निरंतर कार्य किया। उनके प्रयासों से अनेक गांवों के बच्चों को गंभीर कुपोषण से बाहर निकालने में सफलता मिली और हजारों बच्चों तक स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी जागरूकता पहुंची।

आज गोडबोले दंपत्ति ‘बनफूल’ के माध्यम से जनजातीय बच्चों के स्वास्थ्य और समग्र विकास के लिए कार्य कर रहे हैं। उनका मानना है कि सेवा केवल उपचार देने का नाम नहीं, बल्कि समाज के साथ आत्मीय संबंध बनाकर उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम है। राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के हाथों पद्मश्री सम्मान प्राप्त करना उनके तीन दशक से अधिक समय तक किए गए निस्वार्थ सेवा कार्य की राष्ट्रीय स्वीकृति है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी उनके योगदान की सराहना करते हुए इसे समाज सेवा की प्रेरणादायी मिसाल बताया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने गोडबोले दंपत्ति के सेवा कार्यों की सराहना करते हुए हरसंभव सहयोग और समर्थन का आश्वासन दिया।
गोडबोले दंपत्ति की यात्रा यह संदेश देती है कि यदि सेवा में समर्पण, संवेदनशीलता और दृढ़ संकल्प हो, तो कोई भी क्षेत्र दूर नहीं होता और कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। उन्होंने केवल बस्तर में काम नहीं किया, बल्कि अपने पूरे जीवन को बस्तर के लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। यही समर्पण आज उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में स्थान दिलाता है और आने वाली पीढि़यों के लिए उन्हें प्रेरणा का जीवंत स्रोत बनाता है।

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