बंदूक छोड़ मासा और जयमोती ने थामी उम्मीद की डोर, आज अपनी 'छोटी सी दुकान' से चला रहे परिवार

बंदूक छोड़ मासा और जयमोती ने थामी उम्मीद की डोर, आज अपनी 'छोटी सी दुकान' से चला रहे परिवार

बीजापुर। कहते हैं कि सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। लेकिन जब रास्ता घने जंगलों, बारूद की गंध और बंदूकों के साए से होकर गुजरता हो, तो वापसी की राह इतनी आसान नहीं होती। छत्तीसगढ़ के बीजापुर के वनांचल में रहने वाले मासा तामो और उनकी पत्नी जयमोती की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कभी जिन हाथों में मौत का सामान हुआ करता था, आज उन्हीं हाथों में राशन की थैलियां और बच्चों के लिए चॉकलेट के डिब्बे हैं। कभी खौफ के साए में जीने वाला यह दंपत्ति आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर आत्मनिर्भरता की एक नई और खूबसूरत इबारत लिख रहा है।

चौपाल के रास्ते में जब अचानक ठहर गया मुख्यमंत्री का काफिला...

बीते 2 जून को प्रदेशव्यापी सुशासन तिहार के तहत मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बीजापुर जिले के सुदूर वनांचल ग्राम कोण्डापल्ली पहुंचे थे। मुख्यमंत्री का काफिला चौपाल की ओर बढ़ रहा था कि अचानक सड़क किनारे बनी एक बेहद साधारण सी किराना दुकान के सामने रुक गया। बाहर से देखने पर यह किसी आम ग्रामीण की दुकान जैसी ही थी, लेकिन इसके भीतर जो कहानी सांस ले रही थी, वह बेहद असाधारण थी।
मुख्यमंत्री खुद गाड़ी से उतरे और दुकान के भीतर दाखिल हो गए। सामने मासा तामो और जयमोती खड़े थे। मुख्यमंत्री ने दोनों से बेहद आत्मीयता से बात की, उनके चेहरे की मुस्कान और जिंदगी में आए बदलाव को महसूस किया। इसी बातचीत के बीच मुख्यमंत्री ने दुकान से पानी की एक बोतल खरीदी, पैसे चुकाए और दोनों की पीठ थपथपाते हुए कहा - "आत्मनिर्भरता ही नए जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची पहचान है। आप दोनों पर पूरे समाज को गर्व है।"


अभावों का बचपन और भटकाव का वो रास्ता

मासा तामो का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था। होश संभालने से पहले ही सिर से पिता का साया उठ गया। गरीबी ऐसी कि स्कूल की चौखट तक कदम कभी पहुंच ही नहीं पाए। साल 2007 में हालातों और भटकाव ने मासा को नक्सली संगठन की ओर धकेल दिया। दूसरी तरफ, जयमोती की दास्तां भी अलग नहीं थी। उसने भी बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया था। जिंदगी के थपेड़ों और अकेलेपन से जूझती हुई जयमोती भी उसी डरावने रास्ते पर चल पड़ी।
जंगल के उसी खौफनाक माहौल में दोनों की मुलाकात हुई। बंदूक की नली के साए में धीरे-धीरे दोनों का दिल एक-दूसरे से जुड़ा और साल 2021 में उन्होंने शादी कर ली।

यह रास्ता हमारी आने वाली पीढ़ी को बर्बाद कर देगा...

शादी के बाद जब दोनों ने शांत दिमाग से सोचा, तो उन्हें अहसास हुआ कि हिंसा की इस राह का कोई अंत नहीं है। यह रास्ता न तो उनके भविष्य के लिए सही है और न ही उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए। आखिरकार, अक्टूबर 2025 में दोनों ने एक बड़ा और साहसी फैसला लिया। उन्होंने बंदूकें छोड़ीं, सरेंडर किया और मुख्यधारा में लौट आए।


पुनर्वास केंद्र में मिला अक्षर ज्ञान

आत्मसमर्पण के बाद बीजापुर पुनर्वास केंद्र में दोनों की जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ। जिस उम्र में लोग कमाते हैं, उस उम्र में मासा और जयमोती ने पहली बार कागजों पर अक्षरों को उकेरना सीखा। उन्हें कौशल विकास की ट्रेनिंग दी गई। प्रशासन ने भी संवेदनशीलता दिखाई और दोनों के जरूरी दस्तावेज—जैसे राशन कार्ड, आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड, जाति प्रमाण पत्र और बैंक खाता बनवाने में पूरी मदद की।
इसके बाद महिला एवं बाल विकास विभाग की 'सक्षम योजना' के तहत जयमोती को 1 लाख रुपये का लोन स्वीकृत हुआ। इसी रकम से दोनों ने कोण्डापल्ली में अपनी एक छोटी सी किराना दुकान खोली।

अब आंखों में बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना

मुख्यमंत्री से बात करते हुए मासा और जयमोती की आंखें भर आईं, लेकिन उनमें डर नहीं, बल्कि स्वाभिमान की चमक थी। उन्होंने बताया, "अब हम समाज में सिर उठाकर, सम्मान के साथ जी रहे हैं। दुकान से जो भी कमाई होती है, उससे परिवार का खर्च आराम से चल जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है। हम उन्हें पढ़ाएंगे-लिखाएंगे और अच्छा इंसान बनाएंगे।"

मासा और जयमोती की कहानी सिर्फ एक आत्मसमर्पण की दास्तां नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि अगर भटक चुके हाथों को सही समय पर सही अवसर, भरोसा और सहानुभूति मिल जाए, तो बारूद के ढेर पर भी जिंदगी की नई कोंपलें फूट सकती हैं।