विश्व अस्थमा दिवसः छत्तीसगढ़ के लिए एक तात्कालिक पुकार
रायपुर (चैनल इंडिया)। हर वर्ष मई के पहले मंगलवार को दुनिया विश्व अस्थमा दिवस मनाती है। यह पहल ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा (GIN) द्वारा संचालित है- एक ऐसा अवसर, जब हम एक ऐसी बीमारी पर विचार करते हैं जो आम है, दीर्घकालिक है, और फिर भी दुखद रूप से कम आंकी जाती है। इस वर्ष का विषय स्पष्ट और प्रभावशाली हैः अस्थमा से पीड़ित सभी लोगों के लिए एंटी इन्फ्लेमेटरी इनहेलर्स की उपलब्धता अभी भी एक तात्कालिक आवश्यकता। यह सिर्फ एक नारा नहीं है। यह एक चेतावनी है।
हमारे अपने क्षेत्र में छिपा बोझ भारत में अस्थमा लाखों लोगों को प्रभावित करता है, लेकिन इसकी वास्त्रविकता स्थानीय स्तर पर और भी गंभीर है। छत्तीसगढ़ में यह चुनौती कई स्तरों पर मौजूद है। रायपुर और आसपास के क्षेत्रों में तेजी से हो रहे शहरीकरण ने वायु प्रदूषण को बढ़ाया है, वहीं ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में लकड़ी और कोयले से खाना पकाने का धुआं बच्चों के फेफड़ों को चुपचाप नुकसान पहुंचा रहा है। इसके साथ ही खनन क्षेत्रों की धूल, कृषि से जुड़े एलर्जन और औद्योगिक संपर्क इस समस्या को और बढ़ाते हैं। साफहै कि यहां अस्थमा दुर्लभ नहीं है बल्कि अक्सर पहचान में नहीं आता। लेकिन असली खतरा बीमारी में नहीं, बल्कि इसके प्रबंधन में है। बहुत से मरीज अभी भी केवल अस्थायी राहत देने वाली दवाओं पर निर्भर हैं। कई लोग जांच में देरी करते हैं। और अब भी बहुत से लोग
इनहेलर से डरते हैं विज्ञान के बजाय मिथकों के कारण। दूरदराज के क्षेत्रों में, सही निदान होने के बाद भी आवश्यक दवाएं नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होतीं।
एक उपचार योग्स बीमारी-एक टाली जा सकने वाली त्रासदी अस्थमा कोई मौत की सजा नहीं है। सही उपचार के साथ, यह सबसे नियंत्रित होने वाली दीर्घकालिक बीमारियों में से एक है। त्रासदी यह है कि गंभीर दौरे, अस्पताल में भर्ती और मौतें अभी भी होती हैं इसलिए नहीं कि इलाज नहीं है, बल्कि इसलिए कि इलाज उन तक नहीं पहुंचता जिन्हें इसकी जरूरत है। इस वर्ष के विषय का मुख्य संदेश सरल है। एंटी-इन्फ्लेमेटरी इनहेलर जीवन बचाते हैं। नियमित उपयोग से दौरे रोके जा सकते हैं सिर्फ इलाज ही नहीं।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लिए यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। जागरूकता से कार्रवाई तकः क्या बदलना होगा, मरीजों और परिवारों के लिएः शुरुआत घर से करें अस्थमा नियंत्रण घर से शुरू होता है। बार बार खांसी, सांस फूलना या घरघराहट को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उपचार नियमित होना चाहिए, न कि केवल जरूरत पड़ने पर। इनहेलर सुरक्षित, प्रभावी और जीवन रक्षक हैं लेकिन तभी जब उनका सही और नियमित उपयोग किया जाए। डॉक्टरों के लिएः केवल राहत नहीं, विज्ञान पर आधारित उपचार दें स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को केवल लक्षणों के अस्थायी इलाज से आगे बढ़ना होगा। कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी जागरूक और वैज्ञानिक चिकित्सा गंभीर बीमारी को रोक सकती है। सरकार और नीति निर्माताओं के लिएः इरादे नहीं, उपलब्धता सुनिश्चित करेंइस वर्ष के विषय की असली परीक्षा इसके कार्यान्वयन में है। हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर आवश्यक इनहेलर उपलब्ध होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन की पहुंच बढ़नी चाहिए। शहरी वायु गुणवत्ता पर सख्त निगरानी और नियंत्रण होना चाहिए। जन जागरूकता अभियान स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक समझ के साथ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने चाहिए। स्वास्थ्य समानता केवल नीतियों से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी कार्यान्ध्यन से हासिल होती है।
डॉ. दिपेश मास्के, वरिष्ठ सलाहकार, पल्मोनोलॉजी, नारायणा एमएमआई अस्पताल, रायपुर

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