बढ़ रहे हैं रेप, हम अधिकारों का जश्न मना रहे: हाईकोर्ट
बिलासपुर। दुष्कर्म के एक मामले में निचली अदालत ने दिया है आजीवन कारावास की सजा को चुनौती देते हुए दायर अपील पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस तरह के मामलों को लेकर गहरी चिंता जताई।
डिवीजन बेंच ने कहा कि यह गहरी चिंता की बात है, महिलाओं के खिलाफ अपराध, खासकर रेप के मामले बढ़ रहे हैं और हम महिलाओं के अधिकारों का जश्न मना रहे हैं। डिवीजन बेंच ने इस टिप्पणी के साथ दुष्कर्म के आरोपी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उम्र कैद के फैसले को यथावत रखा है। डिवीजन बेंच ने कोर्ट कहा कि यह सेक्स क्राइम के पीडि़तों की मानवीय गरिमा का उल्लंघन, समाज के बेपरवाह रवैये की एक दुखद झलक है। रेप के आरोप में आरोपी पर मुकदमा चलाते समय कोर्ट की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को पूरी संवेदनशीलता के साथ देखना चाहिए। कोर्ट को किसी केस की बड़ी संभावनाओं की जांच करनी चाहिए और प्रॉसिक्यूटर के बयान में छोटी-मोटी उलझनों या मामूली अंतर से प्रभावित नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही प्रॉसिक्यूटर की गवाही को पूरे केस के बैकग्राउंड में समझा जाना चाहिए और ट्रायल कोर्ट को अपनी जम्मेिदारी के प्रति जागरूक होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सेक्सुअल छेड़छाड़ से जुड़े मामलों से निपटते समय संवेदनशील होना चाहिए।
मामला रायपुर जिले का है। इसमें डीएनए रिपोर्ट नेगेटिव पाई गई है। इस पर कोर्ट ने कहा कि साइंटिफिक रिपोर्ट सिर्फ एक राय है और यह पीडि़ता और चश्मदीद गवाह के सबूतों पर कोई अहमियत नहीं देती, इसलिए अपील करने वाले को इन रिपोर्टों का कोई फायदा नहीं दिया जा सकता। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलार्थी को किए गए अपराध के लिए जो सजा दी है, उसमें कोई गैर-कानूनी या गलत काम नहीं है। अपीलार्थी के खिलाफ उस अपराध में उसे दोषी ठहराने के लिए काफी और भारी सबूत हैं। इसलिए, अपील खारिज की जाती है। आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्र कैद की पूरी सजा काटनी होगी।

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