भगवद भजन ही सबसे बड़ा धर्म : इंदुभवानंद तीर्थ
रायपुर। श्री शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में चल रहे चातुर्मास्य प्रवचन सत्संग के क्रम को गति देते हुए में शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. इंदुभवानंद तीर्थ महाराज ने बताया कि भगवद् भजन ही सबसे बड़ा धर्म है। यही जीवन का सार है,जिसने भगवान का भजन किया उसका मानव जीवन सफल हो जाता है। इसलिए प्राणी को सदा सर्वदा भगवद् भजन में ही संलग्न रहना चाहिए। लौकिक धर्मों को उतना महत्व नहीं देना चाहिए। दूसरों के कभी गुण दोषों का चिंतन नहीं करना चाहिए गुणों के चिंतन करने से आसक्ति बढ़ती है और दोष के चिंतन करने से द्वेष बढ़ता है। आसक्ति भी व्यक्ति को फसाने का काम करती है। अतः आसक्ति से भी बचना चाहिए।

धुंधकारी के आख्यान को विस्तार देते हुए सुधि कथा वक्ता ने बताया कि धुंधकारी ने अपनी माता को जलती हुई लकड़ी से मारना प्रारंभ किया और कहा बता धन कहां रखा है। माता अत्यंत दुखी हुई और उसने सूखे कुएं में अपने प्राणों का परित्याग कर दिया गोकर्ण महाराज जी भी तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए। धुंधकारी स्वतंत्र हो गया वह पांच पांच वेश्याओं को लेकर के भोग विलास में लिप्त हो गया। मानव का शरीर भोग विलास के नहीं अपितु भगवान के भजन के लिए प्राप्त हुआ है। इस अस्थिर शरीर से स्थिर फल अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिए मनुष्य का शरीर अस्थिर है और इसे प्राप्त होने वाला फल(धर्म) स्थिर है। अतः प्राणी को नित्य फल प्राप्त करने के लिए चेष्टा करना चाहिए। भला मोह पूर्वक लालन-पालन करके यदि इस अनित्य शरीर को हृष्ट पुष्ट और बलवान भी बना लिया तो भी भगवद् भजन सुने बिना इससे क्या लाभ है।

वृद्धावस्था व शोक के कारण यह परिणाम में दुखप्रद ही है रोगों का तो घर ही है यह निरंतर किसी न किसी कामना से पीड़ित रहता है। कभी इसकी तृप्ति नहीं की जा सकती है। इसे धारण किये रहना भी कठिन काम है, इसके रोम रोम में दोष है और नष्ट होने में इसको एक क्षण ही लगता है। अंत में यदि इसे गाड दिया जाता है इसके कीड़े बन जाते हैं। कोई पशु खा जाता है तो विष्टा (मल) हो जाता है और अग्नि में जला दिया जाता है तो भस्म की ढेरी हो जाता हैव यह तीन ही इसकी गतियां बताई गई हैं ऐसे अस्थिर शरीर से मनुष्य को अविनाशी फल धर्म (भगवद् भजन) अवश्य कर लेना चाहिए। कथा के पूर्व समस्त श्रोताओं ने भागवत भगवान की पोथी का पूजन किया तथा संस्कृत के छात्रों ने मंगल पाठ किया।
admin



