छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना ठोस कारण ससुराल छोड़ने वाली पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पत्नी बिना किसी वैध या पर्याप्त कारण के अपने पति और ससुराल से अलग रहने का फैसला करती है, तो वह मासिक भरण-पोषण पाने की कानूनी हकदार नहीं होगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिलासपुर निवासी प्रवीण कुमार वेदुला और उनकी पत्नी से जुड़ा है। दोनों का विवाह 10 फरवरी 2019 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी ने पति और ससुराल वालों पर दहेज प्रताड़ना, 10 लाख रुपये और कार की मांग करने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई थी। हालांकि, निचली अदालतों में ये आरोप सिद्ध नहीं हो सके और उसकी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां और फैसला
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने परिवार न्यायालय (Family Court) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे:
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वैध कारण का अभाव: कोर्ट ने पाया कि पत्नी के पास ससुराल छोड़ने का कोई ठोस या उचित कारण नहीं था।
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पति की कोशिशें: पति ने अपना घर बचाने के लिए 'हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9' (दांपत्य अधिकारों की बहाली) के तहत याचिका दायर की थी। वह पत्नी को साथ रखने के लिए तैयार था, लेकिन पत्नी ने साथ रहने से इनकार कर दिया।
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अवसर का त्याग: कोर्ट ने कहा कि जब पति वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू करने का हर संभव प्रयास कर रहा था, तब पत्नी के पास वापस लौटने का अवसर था। स्वेच्छा से अलग रहने का निर्णय लेने के बाद भरण-पोषण की मांग करना न्यायसंगत नहीं है।
न्याय का आधार 'आचरण' भी है
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में केवल पति-पत्नी का संबंध ही नहीं, बल्कि दोनों पक्षों का आचरण (Conduct) भी न्याय का मुख्य आधार होता है। चूंकि पत्नी ने बिना किसी प्रताड़ना के सबूत के अपनी मर्जी से घर छोड़ा, इसलिए वह कानूनन मदद की हकदार नहीं मानी गई।

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